Monday, 10 October 2011

हिंदी और अंग्रेजी - प्रतियोगी या पूरक?

पिछले हफ्ते मैं अपने ससुराल गयी थी और वहाँ बिस्तर के सिरहाने मुझे पुराने मासिक पत्रिकाओं का एक ढेर रखा हुआ मिला.....


यद्यपि मुझे हिंदी भाषा का गहन प्रयोग किये हुए लगभग १५ साल हो गए हैं, परन्तु हाई स्कूल में पढ़ते हुए मातृभाषा में चिंतन-मनन-लेखन का शौक मुझे भली-भाँती स्मरण है! मैं खुद को न रोक पाते हुए इन पत्रिकाओं को पढने में जुट गयी कि तभी मैंने एक नहीं अपितु कई लेख पढ़े जो कि पाश्चात्य-संस्कृति और अंग्रेजी बोल-चाल को हिंदी भाषा के घटते हुए प्रयोग का कारण मानती है. ज्ञातव्य रहे कि यह अंग्रेजी-हिंदी का आपस में दोषा-रोपण कोई आज कि बात नहीं है बल्कि इस खेल की उम्र भारत के स्वाधीनता की जितनी ही है.


मैं जितनी बार ऐसे लेख पढ़ती हूँ, उतने बार आश्चर्य करती हूँ कि हम अंग्रेजी और हिंदी भाषाओं को एक दूसरे का प्रतिद्वंदी मानते हुए दोषारोपण भला क्यूँ करते हैं? अगर दोनों तरफ के महानुभाव और विद्वान् अपने तर्क-वितर्क को दर-किनार कर इन भाषाओं को एक दूसरे के पूरक बनाने की ओर मार्गदर्शन करें तो जाने कितने जरूरतमंदों कि सहायता हो जाए!


किसी भी भाषा का अभिप्राय क्या केवल किसी देश के इतिहास को दर्शाने के लिए होता है? या कि भाषा इतिहास से उठकर वर्तमान और भविष्य कि बागडोर संभालते हुए समाज में संचार, रोजगार और मनोरंजन के प्रखर मापदंड के नए आयाम तय कर सकती है?


Edulever में हमने दोनों भाषाओं को एक दूसरे से अलग करके नहीं अपितु एक साथ रखकर युवा समाज में शिक्षा का स्तर और रोजगार के अवसर को सुधारने कि ओर कुछ ठोस सार्थक प्रयत्न किये हैं.


इसमें प्रमुख हैं:
1. तकनीकी और प्रोद्यौगिक कार्य-कौशल को मातृभाषा में सिखाना
2. उपर्लिखित कार्य-कौशल से जुड़े अंग्रेजी बोल-चाल के न्यूनतम दरकार को पूरा करना
इन प्रयासों की कुछ झांकियां इस प्रकार है.
कोर्स प्रेजेंटेशन हाइजीन एंड सैनिटेशन विषय पर जो कि फास्ट-फ़ूड कोर्स के अंतर्गत है:











यह प्रोफेशनल ड्राइविंग कोर्स के अंतर्गत अंग्रेजी भाषा के मौखिक प्रयोग के लिए युवाओं को दिए जाने वाला एक लेसन हैंड-आउट है:





1 comment:

  1. इस ब्लॉग पर हिन्दी में पोस्ट लिखने के लिए धन्यवाद!

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